एक ऐसा विलेन जिसके पोस्टर देख लोग उन पर थूकते थे।

आज बॉलीवुड में कोई जब भी कोई एक्टर आता है तो उसका सपना होता हैं हीरो बनने। लेकिन एक दौर वो था जब हीरो से ज्यादा विलेन को पूछा जाता था। क्योकि उस समय लोग ये देख कर फिल्म नहीं देखते थे कि हीरो कौन है, बल्कि ये पूछ कर फिल्मों के टिकट खरीदने जाते थे कि फिल्म में विलेन है या नहीं। बॉलीवुड में ये दौर किसी और का नहीं बल्कि प्राण का था।

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‘प्राण’ ये नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं। प्राण हिन्दी फिल्म जगत के एक ऐसे विलेन रहे जिनके पोस्टर देखकर लोग उन पर थूकते थे। जब किसी भी फिल्म में प्राण के होने भर से लोगों को ये समझ आ जाता था कि फिल्म में जान है। बॉलीवुड में ये वो दौर ऐसा था जब प्राण के नाम पर हाउस फुल हो जाते थे।

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प्राण का करियर भी किसी हिंदी फिल्म की कहानी जैसा ही थी और ये उन दिनों की बात है जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था। इनका का जन्म दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता ठेकेदारी का काम करते थे। लेकिन काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। इसलिए प्राण की शिक्षा रामपुर, मेरठ, देहरादून, कपूरथला जैसे शहरों में पूरी हुई।
पढ़ाई पूरी करने के बाद प्राण ने फोटोग्राफी शुरू कर दी। वो हमेशा से ही फोटोग्राफी करना चाहते थे। दरअसल उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वो फिल्मों में भी काम करेंगे। ये लाहौर की बात है। एक बार यूं ही प्राण अपने किसी फोटोग्राफी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे और काम करते-करते कुछ थकान लगी तो प्राण पान की एक दुकान पर आराम करने के लिए रूक गए।

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वहीं पास में एक फिल्म की शूटिंग भी चल रही थी। उन्होने ने एक पान खरीदा और खाने लगे। उनको अंदाज़ा भी नहीं था कि उन्हें काफी देर से कोई देख रहा है। दरअसल कुछ ही दूरी पर फिल्म के निर्माता दलसुख एम पंचौली खड़े थे। वो प्राण के पान खाने और थूंकने की अदा से काफी आकर्षित हुए और इतने आकर्षित के उन्होंने प्राण को फिल्मों में काम करने का ऑफर दे डाला। फिर क्या था। प्राण के यह करियर की नई शुरुआत थी।
साल 1941 से लेकर 1947 के बीच में प्राण ने कई फिल्मों में काम किया। लेकिन फिर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया। बंटवारा हर चीज़ का हुआ और फिल्म इंडस्ट्री भी दो हिस्सों में बंट गई। फिर प्राण मुंबई आ गए लेकिन उन दिनों सभी एक्टरों का अच्छा दौर नहीं था। इंडस्ट्री के आर्थिक हालात भी कुछ खास अच्छे नहीं थे और फिर ऐसे में काम मिलना मुश्किल था। पेट पालने के लिए प्राण को होटलों में काम करना पड़ा।

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फिर कुछ सालों बाद प्राण को ‘बॉम्बे टॉकिज़’ नाम की एक फिल्म में छोटा सा किरदार निभाने का मौका मिला और इसके बाद प्राण का दौर वापस लौटा। लगभग छह दशकों तक प्राण ने बॉलीवुड पर राज किया। अगर फीस की बात की जाए तो प्राण हीरो से भी ज्यादा पैसे लिया करते थे। फिर चाहे हीरो अमिताभ बच्चन ही क्यों न हो।
पर्दे पर प्राण भले ही विलेन का रोल निभाते थे। लेकिन असल जिंदगी में वो बिल्कुल अलग थे। प्राण उन अभिनेताओं में से थे जो उसूलों पर जिंदगी गुज़ारते थे। प्राण ने राजकपूर की फिल्म बॉबी में काम ज़रूर किया लेकिन फीस के तौर पर सिर्फ एक रुपये ही लिया। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। उन दिनों राज कपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म बनाई थी। राज कपूर ने अपनी लगभग साभी जमा पूंजी इस फिल्म पर लगा दी थी। मगर फिल्म फ्लॉप हो गई और सारा पैसा डूब गया।

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इसके बाद ही राज कपूर ने ‘बॉबी’ फिल्म बनाई और ये वो दौर था जब राज कपूर फिल्म में काम कर रहे लोगों को मुश्किल से पैसा दे पाते थे और ऐसे में प्राण ने राज कपूर से दोस्ती निभाते हुए फिल्म में काम किया और फीस के तौर पर सिर्फ एक रुपये ही लिया।
प्राण दोस्ती और उसूलों के लिए अपनी फीस तो बदल सकते थे। लेकिन एक बात ऐसी थी जो प्राण हमेशा अपने कांट्रेक्ट में शामिल करवाते थे और फिर इतना ही नहीं किसी भी कीमत पर इस बात में कोई बदलाव उन्हें पसंद नहीं था। प्राण का कहना था कि जब भी फिल्म की कास्टिंग दिखाई जाए तो उनका नाम सबसे आखिरी में And PRAN कर लिखा जाए।
उस वक्त अधिकतर कास्टिंग में बड़े एक्टर का नाम पहले दिखाया जाता था। जबकि प्राण इतने संपन्न और सफल होने के बाद हमेशा अपना नाम आखिरी में लिखवाते थे। इस महान शख्सियत ने 12 जुलाई 2013 को दुनिया से अलविदा किया। लेकिन आज भी प्राण की अदाकारी और डायलॉग बॉलीवुड और लोगों की जुबां पर हैं।

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