इस महान अभिनेता को मिला था उनके जीवन का सबसे बड़ा ईनाम।

सिनेमा ने हमारे काल्पनिक किरदारों को जीवंत किया। ये वो महान लोग हैं जो हमारे आने से बहुत पहले इतिहास की गोद में सो गए, लेकिन उनका खयाल हमेशा हमारे दिमाग में घूमता रहता है और हम सोचते हैं कि वो दिखने में कैसे रहे होगे, उनकी चाल ढाल बोलने का तरीका कैसा होगा। पर सिनेमा ने हमारी ये मुश्किल बहुत हद तक आसान कर दी। किरदारों ने ऐसा अभिनय किया कि पात्र हमारे जहन में जी उठे। अब आप शहंशाह अकबर को ही ले लीजिए, बहुत सी कहानियां सुनी उनके बारे में, बहुत से किस्से पढ़े होगे लेकिन हमें क्या पता कि अकबर दिखते कैसे थे लेकिन मुगल ए आजम में पृथ्वीराज कपूर द्वारा निभाया गया अकबर का किरदार ही हमारे जहन पर अकबर की छाप बना गया। आज की पीढ़ी ने भले ही जोधा अकबर के बाद ऋतिक रौशन को अकबर मान लिया हो लेकिन जिन्होंने पृथ्वीराज कपूर का जलवा देखा सुना और महसूस किया है उनके लिए हमेशा वही अकबर रहेंगे।

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समूचे बॉलीवुड के ‘पापाजी’ यानी पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर, 1906 को पाकिस्तान के लायलपुर की तहसील समुंद्री में हुआ था। तीन साल की उम्र में उनसे उनकी माँ की गोद छिन गयी। इनके पिता पुलिस में थे, इसीलिए उन्होंने वकालत करना सही समझा। लेकिन उन्हें वकील साहब थोड़े ना बनना था, उनके लिए तो सिनेमाई सल्तनत का सिंहासन इंतजार कर रहा था और सिनेमा तक जाने की राह उन्होंने आठ साल की उम्र में तब खोज ली जब उन्होंने पहली बार स्कूल के नाटक में हिस्सा लिया और इसके बाद पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से वकालत करने लगे। यहीं पर इनका नाटकों के प्रति और लगाव बढ़ा और फिर वो रंगमंच में काम करने के उदेश्य से लाहौर भी गए लेकिन उन्हें काम नहीं मिला जिसका कारण था उनका पढ़ा लिखा होना।
इसके बाद उन्हें चुपके से बंबई आज मुम्बई ने आवाज दी, जिसे सुन कर कपूर साहब मायानगरी की तरफ हो लिए। फिर अनगिनत गैर बम्बईयों की तरह कपूर साहब की भी कहानी वहीं से शुरू हुई। उन दिनों फिल्मों में काम करना सही नहीं माना जाता था तो वे घर से चुपचाप चले आए। बंबई आने तक का पहुँचने का जुगाड़ दोस्तों से मांग कर हुआ। मतलब बंबई आने के बाद अगर कपूर साहब के पास कुछ था तो वह था बस उनकी दमदार शख्सियत का धन। हीरो बनने के लिए ये धन प्रयाप्त था, लेकिन हां बशर्ते किसी पारखी की नजर पड़े तब। अभी वो समय नहीं आया था जब उनकी अनमोल शख्सियत को कोई पारखी मिल पाता। इसीलिए उन्होंने तब तक इंपीरियल फिल्म कंपनी में काम करना सही समझा। यहाँ पर उन्होंने बिना वेतन के एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम किया।

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कपूर साहब को उनका पारखी तब मिला जब कंपनी मालिकों की नजर उन पर पड़ी। 1929 में ‘सिनेमा गर्ल’ फिल्म में मुख्य किरदार मिल गया। यह दौर मूक सिनेमा का था जिसमें उन्होंने ‘दोधारी तलवार’, ‘शेर-ए-अरब’ आदि फिल्मों में काम किया। 1931 में जब पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ बनी तो इन्होंने उसमें भी एक किरदार निभाया और इस एक फिल्म में दाढ़ी मूछें बदल बदल कर उन्होंने बचपन से बुढ़ापे तक के आठ किरदार निभा कर अपने अभिनय का जलवा सबको दिखा दिया।
इसके बाद आई वो फिल्म जिसने कपूर साहब को सिनेमा का सिकंदर बना दिया। जब 1941 में सोहराब मोदी की ‘सिकंदर’ में उन्होंने मुख्य किरदार निभाया तो लगा जैसे सिनेमा को उसका सिकंदर मिल गया और फिर बड़े पर्दे पर उस कोई छह फुट दो इंच कद, दमदार आवाज, और हल्की नीली आंखों वाले लड़के को देख कर ऐसा लगा जैसे सिकंदर फिर से जी उठा हो।

पृथ्वीराज कपूर फोटो - सोशल मीडियाThird party image reference
इसके बाद बहुत कुछ हुआ, पृथ्वी थियेटर की स्थापना और बढ़ी लोकप्रियता से ले कर कपूर साहब के पुत्र राज कपूर साहब का फिल्मों में आना और फेमस हो जाना। इस बीच कपूर साहब बहुत फेमस हुए। लेकिन अभी वो बाकी था जिसके लिए शायद कपूर साहब का जन्म हुआ था। उनका अभी शहंशाह ए सिनेमा बनना बाकी था, उन्हें अभी अकबर को पर्दे पर दोबारा जिंदा करना बाकी था और ये हुआ तब जब 1960 में मुगल ए आज़म आई। फिल्म में अकबर के किरदार के साथ उन्होंने अभिनय का ऐसा शाहकार रचा जिसके कारण आज भी वो अकबर के किरदार ।
फिल्म मुगल ए आजम सिनेमा जगत में मील का पत्थर साबित हुई। कपूर साहब अकबर के किरदार में इस तरह से घुस गए कि लगा अकबर एक बार फिर से जी उठा हो। इसके बाद लोगों ने उन्हे इतना पसंद किया कि उनका नाम दिलीप कुमार और मधुबाला से पहले लेने लगे। इसलिए दिलीप कुमार और मधुबाला नाराज भी हुए थे।
मुगले आजम बनने में काफ़ी विलंब हो रहा था, इसकी कई वजहें थी, जिसकी चर्चा होती रहती थी। इसकी एक वजह ये भी थी कि फ़िल्म में स्टारकास्ट में पृथ्वीराज का नाम सबसे पहले आने वाला था।

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इस बारे में पृथ्वीराज कपूर ने के आसिफ़ को कहा, “क्यों छोटे मोटे झगड़ों में फंसकर फ़िल्म को लटका रहे हो। मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तुम इन दोनों के नाम मुझसे पहले और बड़े अक्षरों में लिख दो।”
इसके बाद आसिफ़ ने कहा था, “दीवानजी, मैं मुगले आज़म बना रहा हूं, सलीम-अनारकली नहीं और यह बात इन दोनों में से किसी को समझ नहीं आती। मेरी इस फ़िल्म का केवल एक हीरो है और वो है अक़बर दी ग्रेट।”
कपूर साहब ने मुगले आजम के लिए सिर्फ एक रूपया अडवांस लिया था जिसके बाद के आसिफ भाविक हो गए थे और के आसिफ को भावुक देख कपूर साहब ने कहा , “आसिफ, मैं आदमियों के साथ काम करता हूं, व्यापारियों या मारवाड़ियों के साथ नहीं।”
एक फिल्म के दौरान कपूर साहब एक भिखारी का किरदार निभा रहे थे। लेकिन इस दौरान एक बूढ़ी औरत उनके पास आई और उन्हें भिखारी समझ कर एक सिक्का दे कर चली गयी। कपूर साहब मुस्कुराए और सिक्का जेब में डाल लिया। कपूर साहब ने वो सिक्का खर्च नहीं किया बल्कि उसे संभल कर रख लिया और बाद में उसे फ्रेम करवा कर अपने ड्राइंगरूम की दीवार पर सजा दिया। इसपर उनका मनना यह था कि ये उनके जीवन का सबसे बड़ा इनाम है, जिसे वो कभी नहीं भूल सकते।

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