आमिर ख़ान फिल्म के हीरो थे, पर ये एक्टर 1 लाइन बोलकर भी ज्यादा याद रहा

हमारे इस समय के महत्वपूर्ण अभिनेताओं में से एक राजकुमार इस बात को बहुत सटीकता से साबित करते हैं. गुड़गांव में रहने वाले, पिता पटवारी और मां गृहिणी बेटे राजकुमार ये भगवान में बहुत यकीन रखते हैं. लोग कहते हैं ऊपरवाले की बदौलत एक्टिंग में यहां तक पहुंचे और ये अंकज्योतिष में भी मानते हैं. अपने नाम में एक ‘एम’ और जोड़ लिया और वो भी तब, जब तक फिल्म करियर शुरू हो चुका था, ‘शाहिद’ समेत 9 फिल्में कर चुके थे, सब लोग उन्हें जान चुके थे.

फिल्म "तलाश" के एक दृश्य में आमिर खान के साथ राजकुमार राव.Third party image reference
वो समाज आपको कैसे देखता है इसकी भी बहुत परवाह करते हैं. अपने नाम में एक ‘एम’ और लगाने के दौरान ही उन्होंने अपने नाम के आगे से ‘यादव’ हटाकर ‘राव’ लगा लिया और उन्होंने वजह ये बताई कि उनकी मां चाहती थीं कि वे राव लगा लें. चाहे वे कुछ भी कहें लेकिन ये बात तब महसूस की जा सकती थी कि अगर आपको मुंबई फिल्म उद्योग में कमर्शियली सफल होना है और अगर आपको परिष्कृत साउंड होते हुए अच्छा ‘एक्टर’ बनना है तो ‘यादव टाइप’ ग्रामीण और ‘नीचा साउंड करने वाला’ नाम हटाना होगा. क्योंकि मसाला और आर्ट दोनों ही फिल्मों में यादव सरनेम वाला कोई बड़ा सितारा नहीं है.
वैसे उपरोक्त तीन-चार बातें एक प्रगतिशील और वैश्विक कलाकार के लिए ऋणात्मक में जाती हैं लेकिन आज राजकुमार फिर भी सफल अभिनेताओं की कतार में आ चुके हैं.

फिल्म “बरेली की बर्फी” में राजकुमार राव.Third party image reference
जब वो नौवीं कक्षा में थे तब एक फर्जी टीवी चैनल ने ऑडिशन करके टीवी सीरियल में काम देने के बहाने उनसे 10,000 रुपये ठग लिए और फिर राजकुमार ने दे दिए. उसके बाद आगे वे थियेटर करने लगे. उनका अभिनय कभी भी महान नहीं था. और यही सबसे बड़ा सबक होता है कि आपको महानता के पीछे जाना ही नहीं है. बाद में राजकुमार ने भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे में प्रशिक्षण ले लिया तो भी उनका अभिनय ऐसा था जैसे कोई अभिनय हो ही नहीं. लेकिन उस समय देखकर बिलकुल नहीं लगा था कि ये लड़का वाकई में यादगार भूमिकाओं वाली फिल्में पा लेगा और उनमें प्र‌भाव छोड़ जाएगा.
जब वो दो साल बाद दिबाकर बैनर्जी के निर्देशन में अपनी पहली फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ में नजर आए तो ठीक वैसा ही ‘अभिनयहीन अभिनय’ कर रहे थे जैसे कि उक्त डिप्लोमा फिल्म में किया और इसी बात को आप उनकी पिछली फिल्म ‘अलीगढ़’ में भी पाएंगे जो पिछले साल प्रदर्शित हुई थी.
शायद यही वजह है कि उनकी हर भूमिका याद रह जाती है. 2011 में बिजॉय नांबियार की आई फिल्म ‘शैतान’ में राजकुमार ने एक भ्रष्ट पुलिसवाले मालवंकर का रोल किया जो शायद फिल्म के सारे पात्रों में सबसे कम स्टाइल के साथ पेश किया गया था. लेकिन बावजूद उसके उनका काम सबसे तत्वपरक था. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में भी ठीक ऐसा ही था. शमशाद आलम का उनका रोल सबसे कम चटोरी बैकस्टोरी वाला था लेकिन उनका chase sequence अपनी दीवानगी के कारण याद है.
इसी बात को सबसे बेहतरी से रीमा कागती की फिल्म ‘तलाश’ में देखा जा सकता है. साल 2012 में प्रदर्शित इस फिल्म में आमिर ख़ान लीड रोल में थे अन्य प्रमुख भूमिकाओं में करीना कपूर, रानी मुखर्जी और राजकुमार राव. वे इस फिल्म में आमिर के सहयोगी और जूनियर पुलिसकर्मी कुलकर्णी के किरदार में थे. आपको इस फिल्म में आमिर का कोई सीन तत्क्षण याद आए न आए, राजकुमार का वो दृश्य जरूर याद आता है जहां इंस्पेक्टर सुरजन और पत्नी रोशनी के बीच गली में बहस होते देख उनका पात्र सिर्फ चार लफ़्ज बोलता है “बाद में आता हूं.” और उस सीन में वे दूर से ही नजर आ रहे होते हैं और अपनी आंखों और चेहरे के भावों का इस्तेमाल भी नहीं कर पाते, बस अपनी शारीरिक भाव भंगिमा से अपनी बेचैनी जाहिर कर देते हैं. उनका वो सीन हमेशा याद रहेगा.

“तलाश” के एक दृश्य में आमिर और रानी. पीछे खड़े राजकुमार मुश्किल से दिख रहे हैं.Third party image reference
एक अभिनेता के तौर पर जो दूसरी सबसे जरूरी बात उनमें है वो ये समझदारी कि एक एक्टर हमेशा अपने पात्रों से जाना जाता है, क्योकि वो जैसे किरदार चुनता है वैसा ही उसका महत्व रह पता है. ठीक ऐसा ही नसीरुद्दीन शाह कहते रहे हैं. ये बात बहुत कम नए एक्टर समझ पाते हैं. राजकुमार ये समझे और ये शुरू से ही उनमे दिखा.
साल 2013 में जब निर्देशक अभिषेक कपूर की फिल्म ‘काई पो छे’ प्रदर्शित हुई तो उसमें राजकुमार को देख तभी स्पष्ट हो गया था कि वे ‘शाहिद’ और ‘सिटीलाइट्स’ जैसी फिल्में ही करेंगे जो कहानी व किरदारों पर टिकी हैं और इसी तरह उस फिल्म के बाकी दो प्रमुख एक्टर्स की आगे की यात्रा का भी अंदाजा हो गया था. सुशांत सिंह राजपूत ने जैसा रोल किया और जैसा अभिनय किया उससे जाहिर था कि वे ‘शुद्ध देसी रोमैंस’ जैसी फिल्में ही चुनेंगे जो बड़े बैनर की हों और जिनमें वे हीरो हों.

फिल्म शाहिद में मानवाधिकार कार्यकर्ता वकील की भूमिका में राजकुमार राव.Third party image reference
(अब तक ‘शाहिद’ उनकी सबसे सार्थक फिल्म मानी जा सकती है और जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी 2014 में प्रदान किया गया. इसके अलावा राजकुमार ने ‘रागिनी एमएमएस’, ‘चिटगॉन्ग’, ‘क्वीन’, ‘डॉली की डोली’ और ‘हमारी अधूरी कहानी’ जैसी फिल्में भी की हैं और इन फिल्मों में राज के काम को बहुत सराहा गया था. )
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