वो बदकिस्मत एक्टर जिसकी सबसे बड़ी हिट पिक्चर उसका करियर खा गई!


चंकी पांडे. फिल्म इंडस्ट्री का वो शख्स जिसे एक्टिंग से ज़्यादा शानदार पीआर (पब्लिक रिलेशंस) के लिए जाना जाता है. क्योंकि वो सर्वविद्यमान हैं. बॉलीवुड का कोई ऐसा फंक्शन नहीं है, जहां चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान लिए चंकी पांडे नज़र न आएं. और ये आज की बात नहीं है, चंकी शुरू से ऐसे रहे हैं. शाहरुख खान भी ये मानते हैं कि चंकी मुंबई में वो पहले आदमी थे, जिन्होंने उनकी मुलाकात फिल्मी लोगों से करवाई. अगर एक्टिंग करियर की बात की जाए, तो वो उन बदकिस्मत एक्टर्स में से हैं, जिनके करियर में सबकुछ सही गया लेकिन करियर कहीं नहीं गया. यहां सिर्फ इंडिया की बात हो रही है. बांग्लादेश में उनकी पॉपुलैरिटी का आलम ये है कि उन्हें लोग अलोम से भी ज़्यादा पसंद करते हैं. लास्ट लाइन को उसी गिल्टी-प्लेज़र के साथ लिया जाए, जैसे ‘हाउसफुल’ सीरीज़ में चंकी पांडे के ‘अम्मा मियां’ और ‘आय एम जोकिंग’ को लिया जाता है.
खैर, एक दौर में बॉलीवुड के सबसे उदीयमान सितारों में गिने जाने वाले चंकी पांडे के साथ हुआ क्या? पूरी इंडस्ट्री से दोस्ती रखने वाले चंकी को अचानक से बॉलीवुड ने खुद से दूर क्यों कर दिया? बांग्लादेश में उनकी पॉपुलैरिटी का राज़ क्या है? ये वो सवाल हैं, जो उनसे चंकी पांडे बनने के बाद पूछे गए. लेकिन
वो चंकी पांडे बने कैसे?
चंकी अपने परिवार के दूसरे सदस्य हैं, जिनका अपना वीकिपीडिया पेज है. उनके पापा शरद पांडे मुंबई के मशहूर हार्ट सर्जन थे. इंडिया में जिन डॉक्टर्स की टीम ने पहली हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी की थी, शरद भी उस टीम का हिस्सा थे. 26 सितंबर, 1962 को डॉ. शरद और डॉ. स्नेहलता पांडे (फिज़िशियन) के घर एक बेटा हुआ. नाम रखा गया सुयश. ‘सु’ माने अच्छा और ‘यश’ मतलब सक्सेस. लेकिन उस सफलता का इंतज़ार चंकी अभी तक कर रहे हैं. ये बात चंकी बिना शब्दों का हेर-फेर किए हर इंटरव्यू में कहते हैं. जब पैदा हुए तब काफी गुलथुल थे. इन्हें संभालने वाली नैनी ने इन्हें चंकी बुलाना शुरू कर दिया. और बाद में इंडिया ने भी उन्हें इसी नाम से जाना. पापा और मम्मी दोनों डॉक्टर थे, इसलिए बचपन से चंकी पर भी डॉक्टर बनने का ही प्रेशर था. इस प्रेशर के तले वो दबते चले गए और दसवीं में ही कई बार फेल हुए. पढ़ाई छोड़कर एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने लगे. जहां चंकी ट्रेनिंग लेते थे, वहीं कुछ टाइम बाद अक्षय कुमार भी आए. चंकी सीनियर हो चुके थे, इसलिए वो अक्षय को डांस और एक्टिंग की क्लास दिया करते थे.
मदर टेरेसा के साथ चंकी के पिता शरद पांडे और दूसरी तस्वीर में न्यूकमर चंकी.
फिल्मों में आने से पहले बड़ी हीरोइनों के साथ काम कर चुके थे
एक्टिंग क्लास वगैरह के बाद वो काम की तलाश में यहां-वहां जाते रहते थे. काफी फ्रेंड्ली नेचर के थे, इसलिए उनका सर्कल लंबा-चौड़ा था. भले ही वो फिल्मों में काम न करते हों लेकिन सबको पता था कि वो फिल्मों में काम करना चाहते हैं. शायद इसे ही शास्त्रों में पीआर कहा गया है. एक बार मशहूर फिल्म मैग्ज़ीन सिने ब्लिट्ज़ के कवर स्टोरी के लिए फोटोशूट चल रहा था. मीनाक्षी शेषाद्री, पूनम ढिल्लौं और पद्मिनी कोल्हापुरी एक साथ इस फोटोशूट में हिस्सा ले रही थीं. कवर स्टोरी का नाम था ‘थ्री एलिजिबल गर्ल्स हंट फॉर हस्बैंड’ (Three eligible girls hunt for husband). इस शूट के लिए एक ऐसा लड़का चाहिए था, जो अच्छा दिखे लेकिन उसका इस्तेमाल सिर्फ फ्रेम रखे किसी ऑब्जेक्ट की तरह होगा, जिसे प्रॉप कहते हैं. इस फोटोशूट के लिए फोटोग्रफर राकेश श्रेष्ठा (मशहूर सेलेब्रिटी फोटोग्रफर रोहन श्रेष्ठा के पिता) ने फटाक से चंकी का नाम सुझाया. लोग नहीं समझे, फिर उन्होंने कहा हार्ट सर्जन शरद पांडे का बेटा. और इस तरह चंकी को उनका पहला प्रोजेक्ट मिला.
सिनेब्लिट्ज़ फोटोशूट के दौरान पद्मिनी कोल्हापुरी, मीनाक्षी शेषाद्री  और पूनम ढिल्लौं के साथ चंकी पांडे. 

प्रोड्यूसर का नाड़ा खोला और फिल्म मिल गई
सुनने में ऊपर वाली लाइन कास्टिंग काउच टाइप लग रही है. लेकिन हुआ लिटरली वही था, जो सबहेड में लिखा हुआ है. चंकी का करियर संजय दत्त के साथ शुरू हुआ था. 1981 में आई संजय की डेब्यू फिल्म ‘रॉकी’ में चंकी एकाध सीन में दिखाई दिए. लेकिन ऑफिशियली उनके करियर की पहली फिल्म थी 1987 में आई ‘आग ही आग’. चंकी एक पार्टी में गए हुए थे. वहां वो शराब के नशे में धुत वॉशरूम में गए. वॉशरूम में पहलाज निहलानी पहले से खड़े थे. भारी संकट में. वो पार्टी में कुर्ता-पजामा पहनकर आए थे लेकिन सूसू करने के लिए पजामे का नाड़ा ही न खुले. चंकी ने उनका नाड़ा खोल दिया. निहलानी ने पूछा कि क्या करते हो, चंकी ने कहा एक्टर बनना चाहता हूं. जवाब आया वो अपनी अगली फिल्म में उन्हें कास्ट कर रहे हैं. चंकी को लगा कि वो कुछ ज़्यादा नशे में हैं. उन्हें यकीन नहीं हुआ. फिर पहलाज निहलानी ने अपना परिचय दिया कि उन्होंने अभी-अभी गोविंदा नाम के एक्टर को लॉन्च किया है. ‘आग ही आग’ से चंकी लॉन्च हुए और फिल्म बड़ी हिट रही. इसमें चंकी के अलावा धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, मौसमी चटर्जी और नीलम ने काम किया था.
पहलाज निहलानी के साथ चंकी पांडे. दूसरी ओर चंकी की पहली फिल्म ‘आग ही आग’ का पोस्टर.
चंकी पांडे- द नेक्स्ट बिग थिंग
‘आग ही आग’ के बाद चंकी को अच्छा काम मिलने लगा. वो 1988 में ‘तेजाब’ और ‘पाप की दुनिया’ समेत पांच फिल्मों में नज़र आए. इनमें से अधिकतर में या तो वो सीनियर स्टार्स के साथ काम कर रहे थे, या पैरलल लीड. ‘तेजाब’ में निभाया उनका ‘बब्बन’ का किरदार बहुत पसंद किया गया. इस फिल्म में डेथ सीन को चंकी के करियर के कुछ शानदार कामों में गिना जाता है. इसी फिल्म में उन पर ‘सो गया ये जहां’ गाना भी फिल्माया गया था. अगले कुछ सालों में चंकी ‘जख्म’ (1989), ‘जहरीले’, ‘खिलाफ’ (1990) और ‘विश्वात्मा’ (1992) जैसी सफल फिल्मों में नज़र आए. उन्हें बॉलीवुड का अगला बड़ा सितारा और पता नहीं क्या-क्या कहा जाने लगा. लेकिन चंकी के करियर की सबसे बड़ी फिल्म उनका करियर ही खा गई. ये फिल्म थी 1993 में गोविंदा और कादर खान को-स्टारर ‘आंखें’. ये फिल्म बहुत बड़ी हिट रही थी. इसके बाद चंकी को अपने करियर से उम्मीदें बढ़ सी गई थीं. लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. उन्हें ‘आंखें’ के बाद हीरो के भाई-दोस्तों के रोल ऑफर होने लगे. लेकिन चंकी कुछ नया, कुछ चैलेंजिंग चाहते. इसी चाहत ने उन्हें दो साल तक बेरोज़गार रखा. फिल्म ‘आंखें’ से एक गाना देखिए, जिसमें चंकी और गोविंदा नज़र आ रहे हैं:
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